डॉ निधि सजवान:उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में बसंत के आगमन के साथ ही प्रकृति में एक नया उल्लास दिखाई देने लगता है। पहाड़ों की ढलानों पर खिले जंगली फूल, सुहावना मौसम और चारों ओर फैली हरियाली मानो जीवन में नई ऊर्जा भर देते हैं। इसी ऋतु परिवर्तन और प्रकृति के स्वागत का प्रतीक है फूलदेई, जो विशेष रूप से बच्चों का प्रिय लोकपर्व माना जाता है।
फूलदेई मुख्यतः चैत्र मास के आरंभ में मनाया जाता है। इस दिन छोटे-छोटे बच्चे सुबह-सुबह जंगलों और खेतों से रंग-बिरंगे फूल चुनकर लाते हैं। फिर वे गाँव के प्रत्येक घर की दहलीज पर जाकर फूल बिखेरते हैं और मंगलकामना के गीत गाते हैं। यह परंपरा केवल उत्सव नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, सौहार्द और शुभकामनाओं का प्रतीक है।
फूलदेई के अवसर पर बच्चे घर-घर जाकर एक पारंपरिक पंक्ति गाते है
“फूल देई, छम्मा देई,
दैणी द्वार भर भकार,
यो देली सौं बारम्बार नमस्कार।”
इसका अर्थ है कि घर की दहलीज फूलों से सजी रहे और उस घर में सदा समृद्धि और खुशहाली बनी रहे। घर के लोग बच्चों को आशीर्वाद देते हैं और बदले में उन्हें गुड़, चावल या मिठाई देते हैं। इस प्रकार यह पर्व बच्चों में आनंद और उत्साह का संचार करता है।
फूलदेई का संबंध केवल उत्सव से ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता से भी है। पहाड़ के लोग सदियों से प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीते आए हैं। इसलिए यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि हम प्रकृति की सुंदरता को पहचानें और उसका संरक्षण करें।
आज आधुनिक जीवनशैली और शहरों की ओर बढ़ते पलायन के कारण कई लोकपरंपराएँ धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। फिर भी पहाड़ के कई गाँवों में फूलदेई का उत्सव आज भी पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व हमें अपनी जड़ों, संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।
वास्तव में फूलदेई केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पहाड़ के जीवन की सरलता, मासूमियत और प्रकृति प्रेम का सुंदर प्रतीक है। जब बच्चों की मधुर आवाज़ में “फूल देई, छम्मा देई” की गूंज सुनाई देती है, तो लगता है जैसे पहाड़ की संस्कृति और परंपराएँ आज भी उतनी ही जीवंत हैं जितनी सदियों पहले थीं। 🌸

