पहाड़ की पहचान: उत्तराखंड की लोकसंस्कृति आज भी जीवंत

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उत्तराखंड की लोकसंस्कृति राज्य की सामाजिक चेतना, प्राकृतिक परिवेश और सामूहिक जीवनशैली का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है। पर्वत, नदियाँ, जंगल और गाँव—सब मिलकर यहाँ की सांस्कृतिक पहचान को गढ़ते हैं। गढ़वाल और कुमाऊँ अंचलों की परंपराएँ आज भी लोकजीवन में गहराई से रची-बसी हैं।

पर्व-त्योहारों में झलकती है लोकआस्था

राज्य में मनाए जाने वाले पारंपरिक पर्व लोकसंस्कृति की आत्मा माने जाते हैं। कुमाऊँ का हरेला पर्व प्रकृति संरक्षण और हरियाली के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है, वहीं फूलदेई जैसे त्योहार बच्चों के माध्यम से सामाजिक एकता और पर्यावरण चेतना का संदेश देते हैं। गढ़वाल क्षेत्र की बग्वाल (द्यूलांग) परंपरा सामूहिक साहस और उत्सवधर्मिता को दर्शाती है।

लोकगीत-नृत्य में सुरक्षित है सांस्कृतिक विरासत

उत्तराखंड के लोकगीत और लोकनृत्य पीढ़ियों से सांस्कृतिक स्मृतियों को संजोते आए हैं। झोड़ा-चांचरी जैसे नृत्य सामूहिक सहभागिता और सामाजिक एकता का प्रतीक हैं। वहीं जागर परंपरा लोकदेवताओं—गोलू देवता, ग्वेल देवता और पांडवों—से जुड़ी आस्थाओं को आज भी जीवित रखे हुए है।

पारंपरिक शिल्पकला बनी सांस्कृतिक पहचान

राज्य की लोकसंस्कृति में पारंपरिक शिल्पकला का भी विशेष स्थान है। पौड़ी, टिहरी और अल्मोड़ा क्षेत्रों में लकड़ी की नक्काशी से सजी इमारतें आज भी पारंपरिक वास्तुकला का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। तांबे-पीतल के बर्तन, ऊनी वस्त्र और पारंपरिक आभूषण स्थानीय जीवनशैली से जुड़े हुए हैं।

आधुनिक चुनौतियों के बीच परंपराओं की जद्दोजहद

पलायन, शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली के चलते लोकसंस्कृति को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके बावजूद, स्थानीय मेले, रामलीला मंचन, जागर आयोजन और सांस्कृतिक कार्यक्रम परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों पर युवा पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी इसे नई दिशा दे रही है।

संरक्षण की आवश्यकता पर विशेषज्ञों की राय

सांस्कृतिक विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान समाज की मजबूत नींव है। इसके संरक्षण के लिए दस्तावेज़ीकरण, स्थानीय प्रयासों और सांस्कृतिक मंचों को सशक्त बनाना समय की आवश्यकता है।

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