मसूरी: मसूरी विधानसभा क्षेत्र में इन दिनों सियासी तापमान चरम पर है। हाल ही में संपन्न हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को तगड़ा झटका लगा है। मसूरी मंडल के दोनों महामंत्री—नरेंद्र मेलवान और किरण—जिन्हें संगठन की रीढ़ माना जाता था, भारी मतों से चुनाव हार गए। यही नहीं, भाजपा मंडल के उपाध्यक्ष विजय विंदवाल को भी करारी शिकस्त झेलनी पड़ी।
इन चुनावों में कांग्रेस समर्थित प्रत्याशियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए भाजपा के गढ़ में सेंध लगाई है। विजयी प्रत्याशियों का ग्रामीणों ने ढोल-नगाड़ों और फूल-मालाओं के साथ स्वागत किया, जो साफ संकेत है कि जनता का रुख अब बदल रहा है।
संगठन में असंतोष: नए चेहरों को प्राथमिकता, पुराने कार्यकर्ता उपेक्षित
भाजपा की हार का एक बड़ा कारण संगठनात्मक संतुलन की कमी भी बताया जा रहा है। पार्टी पर आरोप लग रहे हैं कि उसने बिना अनुभव के नए चेहरों को संगठन में अहम पदों पर बैठा दिया, जबकि वर्षों से मेहनत कर रहे पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं को नज़रअंदाज़ किया गया।
यह संगठनात्मक बदलाव न केवल कार्यकर्ताओं में असंतोष का कारण बना, बल्कि पूरे विधानसभा क्षेत्र में हार की ज़मीन भी तैयार कर गया। कई बूथों पर भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं ने खुलकर सहयोग नहीं किया, जिससे कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी मज़बूती से उभरे।
मंत्री गणेश जोशी पर जनता की नाराज़गी
कैबिनेट मंत्री और मसूरी विधायक गणेश जोशी भी इस असंतोष के केंद्र में हैं। कभी बेहद सक्रिय माने जाने वाले जोशी अब जनता की नजरों में ‘कुर्सी पर सवार’ नेता बन गए हैं। लोगों का आरोप है कि मसूरी को तहसील का दर्जा तो मिल गया, लेकिन आज तक स्थायी एसडीएम की तैनाती नहीं हो सकी है।
144 करोड़ रुपये की पेयजल योजना का नाम तो खूब लिया गया, लेकिन ज़मीन पर काम दिखाई नहीं दिया। पर्यटन सीजन में पानी की भारी किल्लत, जर्जर सड़कें, यातायात अव्यवस्था और सफाई की बिगड़ती हालत ने आमजन को बुरी तरह परेशान किया है।
2027 के लिए खतरे की घंटी?
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह केवल पंचायत चुनाव की हार नहीं, बल्कि आने वाले 2027 विधानसभा चुनाव के लिए एक चेतावनी है। अगर भाजपा ने अभी भी जनभावनाओं को नज़रअंदाज़ किया, तो पार्टी को बड़ा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
जनता की दो टूक—“जो हमारे बीच होगा, वही हमारा नेता होगा
स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें केवल चुनाव के समय याद किया जाता है, जबकि असली जरूरत के समय नेता नदारद रहते हैं। “अब वादा नहीं, काम चाहिए। वोट उसे ही मिलेगा जो ज़मीन पर दिखेगा—यह संदेश अब साफ-साफ सुनाई दे रहा है।

