दिल्ली से देहरादून तक का सफर भले ही नए एक्सप्रेसवे के चलते अब करीब ढाई घंटे में सिमट गया हो, लेकिन जमीनी हकीकत इस दावे से बिल्कुल उलट नजर आ रही है। 1 मई के लॉन्ग वीकेंड पर दिल्ली और आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में पर्यटक जब देहरादून और मसूरी की ओर निकले, तो एक्सप्रेसवे की तेज रफ्तार देखते ही देखते ट्रैफिक जाम की सुस्त चाल में बदल गई। जहां एक ओर हाईवे पर गाड़ियां फर्राटा भरती दिखीं, वहीं जैसे ही वाहन देहरादून की सीमा में पहुंचे, हालात पूरी तरह बदल गए।
खासतौर पर मोहंड से लेकर सहारनपुर रोड तक शहर में एंट्री करते समय कई किलोमीटर लंबी वाहनों की कतारें लग गईं। कारें, बसें और पर्यटकों से भरे वाहन घंटों तक रेंगते रहे। कुछ यात्रियों ने बताया कि जहां उन्हें लगा था कि वे 3 घंटे में पहुंच जाएंगे, वहीं एंट्री पॉइंट पर ही 1 से 2 घंटे जाम में फंस गए। इसी तरह दिल्ली की ओर एग्जिट पॉइंट्स पर भी ट्रैफिक स्लो मूवमेंट में नजर आया, जिससे वापसी करने वालों को भी राहत नहीं मिली।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो इस स्थिति की गंभीरता को साफ बयां करते हैं—लंबी-लंबी गाड़ियों की लाइन, हॉर्न की आवाज और बेहद धीमी रफ्तार से खिसकता ट्रैफिक। यह तस्वीरें साफ दिखाती हैं कि एक्सप्रेसवे पर मिली रफ्तार शहर की सीमाओं पर आकर थम जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या सिर्फ बढ़ते ट्रैफिक की नहीं, बल्कि “लास्ट माइल कनेक्टिविटी” की भी है। एक्सप्रेसवे हाई-स्पीड के लिए तैयार है, लेकिन देहरादून शहर की सड़कें उस स्तर की नहीं हैं कि अचानक बढ़े ट्रैफिक दबाव को संभाल सकें। यही कारण है कि एंट्री और एग्जिट पॉइंट्स bottleneck बनकर पूरे सिस्टम को जाम में बदल देते हैं।
नतीजा यह रहा कि ढाई घंटे में पूरा होने वाला सफर एक बार फिर 4 से 6 घंटे तक खिंच गया। पर्यटकों के लिए यह सफर जहां थकाऊ साबित हुआ, वहीं प्रशासन के लिए यह एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। आने वाले पर्यटन सीजन में यदि ट्रैफिक मैनेजमेंट और कनेक्टिविटी पर ध्यान नहीं दिया गया, तो एक्सप्रेसवे की तेज रफ्तार भी यात्रियों को राहत नहीं दे पाएगी।

